Tuesday, 25th December, 2018 -- A CHRISTIAN FORT PRESENTATION

Jesus Cross

18वीं व 19वीं शताब्दी में लोग तेज़ी से मसीही बनने लगे थे, तभी धर्मांतरण के झूठे आरोप लगे



 




 


मीडिया ने कभी नहीं उभारा मसीही समुदाय का पक्ष हम यह बात पहले भी कई बार कह चुके हैं कि शब्द ‘धर्म-परिवर्तन’ मसीही पादरी साहिबान या प्रचारकों पर केवल थोपा गया है, यह शब्द तो उन पर कभी लागू हो ही नहीं सकता। दरअसल, जब कुछ ब्राह्मण लोगों ने 18वीं तथा 19वीं शताब्दी में देखा कि लोग विदेशी मिशनरियों की बात को सुनकर तेज़ी से मसीही बनते जा रहे हैं, तो उन्होंने यह शब्द धक्केशाही से मसीही मिशनरियों के गले डाल दिया। अब तत्कालीन मीडिया तो बहु-संख्यकों की ही सुनता है, अल्प-संख्यकों की वह कम सुनता है। इसी लिए जब मसीही लोगों ने अपने स्पष्टीकरण दिए, तो उनकी बात को किसी ने नहीं उभारा तथा न ही उनकी कोई व्याख्या ही करनी चाही। यह बात जौन सी.बी. वैबस्टर ने 9 नवम्बर, 2001 को दैनिक ‘दि टाईम्स ऑफ़ इण्डिया’ के पत्रकार अमित अगनीहोत्री के माध्यम से बहुत हद तक स्पष्ट कर दी थी परन्तु बहुसंख्यकों के कुछ मुट्ठी भर तथाकथित ‘राष्ट्रवादी’ नेताओं (जिन्हें नेता कहते हुए भी शर्म आती है) ने जानबूझ कर अपने इस ‘धर्म-परिवर्तन’ के राग को छोड़ा नहीं है। वे जानबूझ कर बहु-संख्यकों को मसीही धर्म या अन्य अल्पसंख्यकों के विरुद्ध भड़काते रहते हैं, ताकि देश का माहौल ख़राब बना रहे और उनकी राजनीति की घटिया व नीच दुकान चलती रहे।


सांप्रदायिक तात्त्वों पर कभी कानूनी कार्यवाही नहीं होती

साभारः न्यूज़ झारखण्ड

यदि कोई बात अन्य धर्म का कोई नेता करता है, तो उसके विरुद्ध तुरन्त भारत में फ़ौजदारी कानून की धारा 95 के अंतर्गत मुकद्दमा दर्ज कर लिया जाता है और उस व्यक्ति को भारतीय दण्ड संहिता धारा 124ए, 153 ए या 153 बी या 292 या 293 या 295 ए के अंतर्गत आरोपी करार देकर दण्ड भी दे दिया जाता है। परन्तु यही अपराध जब बहु-संख्यकों के ये बरसाती मेंढक (जो केवल एक राजनीतिक दल की सरकार केन्द्र में आने पर ही दिखाई देते हैं, बाकी समय ये कायर चूहों की तरह अपने बिलों में छिप कर बैठे रहते हैं) करते हैं, तो कोई उनके विरुद्ध कोई सरकार या पुलिस अधिकारी कानूनी कार्यवाही करने की हिम्मत नहीं कर पाता। अब बताएं कि कौन लोग देश-विरोधी हैं और कौन इसे कमज़ोर कर रहा है?


एक सच्चा मसीही कभी दूसरे पर अपना धर्म तो क्या बात भी नहीं थोप सकता

एक सच्चा मसीही प्रचारक या पादरी धर्म-परिवर्तन जैसी चीज़ को कभी किसी व्यक्ति पर ज़बरदस्ती थोप ही नहीं सकता। क्योंकि कोई पादरी या प्रचारक साहिबान कभी यीशु मसीह के सिद्धांतों के विरुद्ध जाकर प्रचार करने की जुर्रअत नहीं कर सकता। यदि 17वीं शताब्दी से लेकर 18वीं शताबदी तक कभी किन्हीं पुर्तगाली शासकों ने ऐसे कदम उठाए भी थे, तो आज उनकी हर मसीही निंदा करता है। किसी प्राणी पर ज़बरदस्ती करने वाला कभी सच्चा मसीही हो ही नहीं सकता।


सदियों से धक्केशाही व अत्याचार के शिकार दलितों ने तेज़ी से अपनाया था मसीहियत को

इसी लिए हमारी दलील है कि ‘ज़बरदस्ती धर्म-परिवर्तन’ के आरोप मसीही लोगों पर केवल थोपे गए हैं, वास्तव में ऐसा कुछ नहीं है। दलित लोगों ने मसीही धर्म को स्वेच्छापूर्वक अपनाया था क्योंकि उनके साथ पिछली कई शताब्दियों से नहीं, बल्कि कई युगों से धक्केशाही होती आ रही थी, उन पर ‘निम्न वर्ग’ का लेबल लगा दिया गया था। उन्हें पढ़ने नहीं दिया जाता था, किसी लड़की या महिला को पढ़ने वे नहीं देते थे, बच्चों की बलियां देते थे, बाल विवाह होते थे, सती प्रथा चलती थी, भारत के कुछ क्षेत्रों में सुन्दर युवतियों को चुन कर अपनी ऐशप्रस्ती के लिए मन्दिर में ‘देवदासी’ का नाम देकर छोड़ दिया जाता था परन्तु कुछ ग़लत प्रकार के ब्राह्मण लोग (सभी नहीं) उनसे वेश्या का घिनावना कुकृत्य करवाया करते थे - ऐसी बहुत सी सामाजिक समस्याएं भारत में थीं परन्तु विदेशी मसीही मिशनरियों व प्रचारकों के आने से दूर हुईं।


दलितों को पूर्ण मान-सम्मान मिला मसीहियत में

भारत में 50 प्रतिशत् मसीही जनसंख्या का मूल दलित वर्ग ही है। उन्हें मसीहियत में आकर मान-सम्मान मिला है। चर्च का यही उद्देश्य था। इन बातों से धर्म के ठेकेदार बन कर घूमने वाले ये मुट्ठी भर ब्राह्मण (सभी नहीं) लोग चिढ़ते थे। उन्होंने तब मसीही मिशनरियों को रोकने के लिए ‘धर्म-परिवर्तन’ की बात गढ़ ली और आज तक इसी बात को केवल मसीही लोगों को नीचा दिखलाने के लिए बिना मतलब रिड़का जा रहा है। जो लोग दलित वर्ग से मसीहियत में आए हैं, उन्हें भारत सरकार अनुसूचित जातियों या अनुसूचित कबीलों का कोई लाभ नहीं देती है परन्तु 1956 में ऐसा लाभ दलित सिक्खों तथा 1990 में दलित बौद्धियों को दे दिया गया था। दलित क्रिस्चियनों को ऐसे लाभ जानबूझ कर नहीं दिए जा रहे। वर्तमान भाजपा सरकार से तो ऐसी किसी स्वीकृति की आस रखनी ही फ़िज़ूल है। भारतीय चर्च आर्थिक तौर पर इतना मज़बूत नहीं है कि वह दलित क्रिस्चियनों की किसी तरह इतने बड़े स्तर पर सहायता कर सके।


Mehtab-Ud-Din


-- -- मेहताब-उद-दीन

-- [MEHTAB-UD-DIN]



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