Tuesday, 25th December, 2018 -- A CHRISTIAN FORT PRESENTATION

Jesus Cross

कांग्रेस पार्टी के प्रारंभिक नेता, लेखक, पत्रकार व पादरी लाल बिहारी डे



 




 


पादरी अलैग्ज़ैण्डर डफ़ के ‘जनरल असैम्बली इनस्टीच्यूट’ में प्रथम पांच विद्यार्थियों में से एक थे लाल बिहारी डे

पादरी लाल बिहारी डे 1885 में स्थापित कांग्रेस पार्टी के प्रारंभिक मसीही नेताओं में से एक थे। वह भी अन्य मसीही स्वतंत्रता सेनानियों की तरह चाहते थे कि अत्याचारी ब्रिटिश शासक भारत को सदा के लिए छोड़ कर चले जाएं। वह मसीही प्रचारक तो कमाल के थे ही, बल्कि बंगाली पत्रकारिता में भी उनका एक नाम था। उनका जन्म 18 दिसम्बर, 1824 को बंगाल में बर्द्धमान के समीप सोनाप्लासी एक निर्धन बैंकर जाति (हिन्दु) परिवार में हुआ था।Lal Behari Dey_Wikipedia गांव में अपनी प्रारंभिक शिक्षा के उपरान्त वह अपने पिता राधाकान्त (जो वर्तमान पश्चिमी बंगाल में आने से पूर्व ढाका (वर्तमान बांगलादेश की राजधानी) में रहा करते थे) के साथ कलकत्ता आ गए तथा उन्होंने पादरी अलैग्ज़ैण्डर डफ़ के ‘जनरल असैम्बली इनस्टीच्यूट’ (जिसे अब स्कॉटिश चर्च कॉलेजिएट स्कूल कहा जाता है) में दाख़िला ले लिया। पादरी डफ़ के उस मसीही संस्थान में सब से पहले 1934 में दाख़िल होने वाले पांच लड़कों में से लाल बिहारी डे भी एक थे। उन्होंने 1844 में इसी संस्थान में शिक्षा ग्रहण की। पादरी डफ़ के नेतृत्त्व में पढ़ते हुए उन्होंने अपनी मर्ज़ी से 2 जुलाई, 1843 को यीशु मसीह को सदा के लिए ग्रहण कर लिया था। विकीपीडिया के अनुसार 1843 में बप्तिसमा लेने से एक वर्ष पूर्व अर्थात ‘‘1842 में उन्होंने एक निबंध लिखा था - ‘दि फ़ाल्सिटी ऑफ़ दि हिन्दु रिलिजन’ (हिन्दु धर्म का झूठ); जिसे एक स्थानीय मसीही सोसायटी ने 50 रुपए का पुरुस्कार भी दिया था।’’


बेटे को इंग्लैण्ड भेजा परन्तु वह हो गया था लापता

26 नवम्बर, 1859 को पादरी लाल बिहारी डे का विवाह सूरत (गुजरात) के पादरी होरमोज़दजी पैस्तेनजी की सुपुत्री बच्चूबाई से हुआ था। उनके धर 4 पुत्रों एवं 5 पुत्रियों ने जन्म लिया था, जिनमें से 2 पुत्र एवं 1 पुत्री का जन्म के कुछ ही समुय के बाद देहांत हो गया था। उन्होंने अपने बड़े सुपुत्र को बैरिस्टर बनाने के उद्देश्य से वकालत की पढ़ाई हेतु 12,000 रुपए (जो आज के 20 लाख रुपए से भी अधिक बनते हैं) ख़र्च करके इंग्लैण्ड भेजा था। परन्तु उसे वकालत की पढ़ाई अच्छी न लगी। वह रोमन कैथोलिक पादरी बन गया था। परन्तु उसके बाद वह कहां चला गया, किसी को कुछ मालूम नहीं।


कई जगह प्रोफ़ैसर व प्रिंसीपल रहे लाल बिहारी डे

लाल बिहारी डे 1855 से लेकर 1867 तक फ्ऱी चर्च आूफ़ स्कॉटलैण्ड के मिशनरी एवं पादरी रहे । 1867 से 1889 तक उन्होंने बेरहामपुर तथा हुगली के सरकारी कॉलेजों में अंग्रेज़ी भाषा के प्रोफ़ैसर के तौर पर कार्य किया। इसी दौरान वह अनेक चर्चों के साथ भी जुड़े रहे। फिर 1867 में बेरहामपुर स्थित कॉलेजिएट स्कूल के प्रिसीपल बन गए थे बाद में वह युनिवर्सिटी ऑफ़ कलकत्ता के हुगली मोहसिन कॉलेज में अंग्रेज़ी एवं मानसिक एवं नैतिक दर्शन-शास्त्र के प्रोफ़ैसर बने ओर 1872 से लेकर 1888 तक यहीं पर रहे। उनके समय में मसीही समुदाय के अधिकतर लोग इंग्लैण्ड के ब्रिटिश शासकों के पक्ष में ही हुआ करते थे। परन्तु पादरी लाल बिहारी डे उन अंग्रेज़ शासकों की भारतीयों के प्रति पक्षपातपूर्ण नीति के सख़्त विरुद्ध थे।


पादरी डे की दो पुस्तकें हुईं अधिक प्रसिद्ध

पादरी डे को अंग्रेज़ी भाषा एवं साहित्य का बहुत अधिक ज्ञान था। इसी लिए उन्होंने अंग्रेज़ी भाषा में दो पुस्तकें ‘गोविन्दा सामन्त’ (1874- जिसका नाम बाद में ‘बंगाल पीज़ैन्ट लाईफ़’ अर्थात ‘बंगाल के किसानों का जीवन’ रख दिया गया था) तथा ‘फ़ोक-टेल्स ऑफ़ बंगाल’ (1883 - बंगाल की लोक-कथायें) लिखीं। ये दोनों ही पुस्तकें अत्यधिक प्रसिद्ध हुईं। बंकिम चन्द्र चट्टोपाध्याय, पीयरी चन्द मित्रा तथा दीनबन्धु मित्रा की तरह ही पादरी लाल बिहारी डे को भी बंगाल के निर्धन एवं दबे-कुचले कृषक वर्ग के साथ अत्यधिक सहानुभूति थी। इसी लिए उनकी पुस्तक ‘गोविन्दा सामन्त’ को 1874में बंगाल के बेहद जागरूक ज़िमींदारों में से एक उत्तरपाड़ा के बाबू जॉय किसन मुकर्जी ने 500 रुपए (उन दिनों यह राशि बहुत अधिक हुआ करती थी) का पुरुस्कार देकर सम्मानित किया था। उस में उन्होंने बंगाल के ग्रामीण एवं मज़दूर जमात के सामाजिक एवं घरेलू जीवन का वर्णन बहुत सुन्दरता से किया था। विश्व प्रसिद्ध बायोलॉजिस्ट, नैचुरलिस्ट तथा ज्योलॉजिस्ट चार्ल्स रॉबर्ट डार्विन (जिनकी मानव-विकास (इवौल्यूशन) के सिद्धांत को आज भी समस्त संसार में मान्यता प्राप्त है) ने पादरी लाल बिहारी डे द्वारा प्रकाशित किए जाने वाले ‘बंगाल मैगज़ीन’ को इंग्लैण्ड में इसी नॉवल ‘गोविन्दा सामन्त’ को पढ़ कर 18 अप्रैल, 1881 को पत्र लिख कर कहा था - ‘‘बंगाल मैगज़ीन के संपादक पादरी लाल बिहारी डे को मैं शुभ-कामनाएं देना चाहता हूँ। कुछ वर्ष पूर्व मैंने ‘गोविन्दा सामन्त’ पढ़ा था और मुझे उसे पढ़ कर अत्यंत प्रसन्नता हुई थी और मुझे काफ़ी कुछ सीखने को मिला।’’


मासिक पत्रिका का संपादन भी किया पादरी डे ने

पादरी लाल बिहारी डे अधिकतर अंग्रेज़ी भाषा में ही लिखा करते थे। परन्तु वह बंगला भाषा की मासिक पत्रिका ‘अरुणोदय’ का संपादन भी किया करते थे। उन्होंने ‘चन्द्रमुखी’ नामक एक बड़ी कहानी भी बंगला भाषा में लिखी थी। वह तीन अंग्रेज़ी पत्रिकाओं ‘इण्डिन रीफ़ार्मर’ (1861), ‘फ्ऱाईडे रीव्यू’ (1866) एवं ‘बंगाल मैगज़ीन’ (1872) के संपादक भी रहे। इसके अतिरिक्त उनके लेख ‘कैलकटा रीव्यू’ तथा ‘हिन्दू पैट्रीऑट’ जैसे प्रसिद्ध समाचार-पत्रों में भी प्रकाशित होते रहे थे। वह ‘बीथ्यून सोसायटी’ तथा ‘बंगाल सोशल साइंस ऐसोसिएशन’ के सदस्य भी रहे। 1877 में वह युनिवर्सिटी ऑफ़ कलकत्ता के फ़ैलो भी बने।

28 अक्तूबर, 1892 (कुछ स्थानों पर वर्ष 1894 भी दिया गया है, परन्तु अधिक प्रामाणित 1892 ही है) को कलकत्ता में उनका निधन हो गया।


Mehtab-Ud-Din


-- -- मेहताब-उद-दीन

-- [MEHTAB-UD-DIN]



भारतीय स्वतंत्रता आन्दोलन में मसीही समुदाय का योगदान की श्रृंख्ला पर वापिस जाने हेतु यहां क्लिक करें
-- [TO KNOW MORE ABOUT - THE ROLE OF CHRISTIANS IN THE FREEDOM OF INDIA -, CLICK HERE]

 
visitor counter
Role of Christians in Indian Freedom Movement


DESIGNED BY: FREE CSS TEMPLATES